Sri Sri Shakti Parivar - Mantra Upchar Sandhya episode 14

कुण्डली में, चंद्र के पितृ-ऋण ( मातृ ऋण)

पाप का कारण :-  माता नीयत बद :- अपनी संतान पैदा होने के बाद माता को दरबदर जुड़ा करना या दुःखी करना या आपका खुद दुःखी हो जाने पर लापरवाही करना।

आम निशानी:- पड़ोस में कुआँ, दरिया, नदी नाला पूजने की बजाये घर की गंदगी बहाने या जाम करने का जरिया बनाया जा रहा होगा।

जब भी आप विद्या से संबंध करे या पशु जो दूध देता हो उससे  संबंध करे, या हो जाये।  चंडी का पैसा, घड़े का पानी , दिल की शांति रात का आराम ,आय का शुरू होना।  फव्वारा , घर का दूध , संसारी मित्र संबंधियों की छुपी मदद , रेशम के सफ़ेद रंग की बजाय दीवारों पर रंग बदलने के लिए मिट्टी की सफेदी में बदलने लगे अर्थात विफल होने लगे। रूपया जमा किया , तो वह बुरे कामो में यानि कफनों , बीमारियों, जुर्माने में खर्च होता गया और ऐसा समय कभी न आया , की कभी दूसरे से ख़ुशी से दूध पिया या पिलाया।  अगर कोई समय आया होगा, तो मित्र को भी जुटी उड़ाने या निःशुल्क के माल उड़ाने की इच्छा ही पैदा हुई होगी।

उपाय:-  खानदान के प्रत्येक सदस्य से  (जहाँ तक खून का संबंध हो)
एक समान चांदी लेकर, एक ही दिन में साफ़ चलते हुए पानी में सिर से सात बार उतारकर जल प्रवाह कर दे।  परिवार का जो सदस्य हिस्सा न दे सके, तो उसके हिस्से का दस गुना ज्यादा आप खुद डाल दे। आपकी किस्मत अमूमन ३४ साल की आयु के बाद में जाएगी।

पितृ ऋण के रिश्तेदार

आपके खंडन के सभी जीवित बेटे और बेतिया जैसे - बाबा, दादा, चाचा, ताऊ, भाई, भतीजे, बहन, बुआ, बेटी (लेकिन बहन, बुआ, बेटी के पति और बच्चो को इसमे न जोड़ें)

अधिक जानकारी के लिए इन नंबर पर संपर्क करे -०१२४- ६६७४६७१
 व्हाटप्प नं- 9821599237

Shiv परिवार का क्या महत्व है

Shiv Parivaar ki mahima
दाम्पत्य जीवन के लिए शिव परिवार, एक आधुनिक परिवार को दर्शाता है। शिव परिवार में गणेश, कार्तिकेय, ज्योति के साथ भवानी शंकर दिखाई देते है । इस परिवार में उनके वाहन भी सम्मिलित है । यह परिवार एक साधारण परिवार जैसा दिखता है, पर यह उनसे कही अधिक प्रसंगों को सरल ढंग से समझाता है ।

इस परिवार के मुखिया है शिव और पार्वती । शुरू करते है गणेश जी से, गणपति गजमुखी है, जो की विघ्नों का अंत करते है और ये प्रथम पूज्य देव बुद्धि देव भी कहे जाते है । शक्ति की गोद में ये शोभा पाते है । इनके शिव परिवार में होने से ये सन्दर्भ मिलता है की प्राणी के दुःख को दूर करने की चाबी आपके परिवार में ही निमित्त है, उस घर में कभी कोई विघ्न नहीं आता जिसे अपने परिवार पर भरोसा हो, उसे मालूम होता है की मेरी माँ, पुत्र, पिता, बहिन, भाई कही न कहीं से विघ्न का रास्ता खोज निकालेंगे ।


भगवन शिव
कार्तिकेय परिश्रम के देवता है, उनका शिव परिवार 
में होना कर्म को प्रभुता देता है । परिवार के हर एक व्यक्ति को अपने कर्म का पूरा बोध होना चाहिए । इनके परिवार सहित पूजा होने से नौकरी, पढ़ाई आदि में दुविधा नहीं आती ।

ज्योति, भगवन शिव की पुत्री हालाँकि शिव परिवार में नहीं दिखाई पड़ती पर यह स्वरुप सदैव निर्गुण रूप में हर घर में ज्योति के रूप में विद्यमान रहती है । पुत्री साक्षात् माता पिता के संस्कारो का दर्पण होता है, उसे विद्या, पोषण और प्रेम से पोषित करना चाहिए ।  वो दूसरे घर जा कर अपने माँ पिता द्वारा दिए इन्ही सब तत्वों का प्रदर्शन करती है । शिव परिवार के सन्मुख ज्योति लगने से सर्व कार्य सीधी का फल मिलता है ।

भगवान शिव का परिवार में होना परिवार के पांच तत्वों को दर्शाता है । शिव अर्थात मंगल और वो इस परिवार में पिता स्वरुप में है । इस लिए पिता को कर्ता दर्शाया है, बच्चों(कर्म) की जरूरतों को पूरा करने हेतु पुरुष को बल, धन सम्पति, निरोग्य रहना चाहिए उसे योग, भोग, कार्य और प्राणायाम कर्म का पालन कर घर को पूर्ण पुष्ट रखना चाहिए, शिव की परिवार सहित भक्ति करने से बल और धन की कामना पूर्ण होती है । साथ ही वह व्यक्ति निरोगी भी रहता है।  

अंत में परिवार की मूल, अर्थात माँ यानि की भगवती पार्वती । कहा जाता है,  एक स्त्री घर बना भी सकती है और पलक झपकते नाश भी कर सकती है । माँ अम्बिका का यह स्वरुप भक्ति, शक्ति, धैर्य, ज्ञान और करुणा का प्रतीक है। माँ को शक्ति का स्वरुप माना है, माँ के सेहत मंद, ज्ञानी, शक्तिपूर्ण, धैर्यवान, दयावान होने से घर में सात्विकता का वास होता है । माँ पार्वती, आधुनिक महिला का दर्पण है जो सिद्ध करता है की स्त्री को पढ़ा लिखा होने के साथ साथ आर्थिक रूप से आत्म निर्भर भी होना चाहिए । माँ की पूजा शिव परिवार में धैर्य और सहनशक्ति को प्रदान करता है ।

शिव परिवार में पशु : - इस परिवार में मूषक, सर्प, मयूर, बैल (नंदी) और सिंह होता है । असलियत में मूषक प्रतीक है फुर्ती का, सर्प प्रतीक है अवसर का, मयूर है सौंदर्य का, बैल है सादगी का और सिंह है सहस और बल का।

इन सभी की प्रकृति एक दूसरे से भिन्न है, जैसे की मूषक का भक्षण करता है सर्प, सर्प का भक्षण करता है मयूर और बैल का शिकार करता है सिंह । इन सभी का एक चित्र में होना दो बातें समझाता है । पहला ये बेशक एक घर में अलग प्रकृति के लोग हो सकते है पर सबको एक सत्य धर्म का बोध सदा रहना चाहिए और उसे बरकरार rakhne के लिए घर में अनुसाशन जरूर होना चाहिए । दूसरा ये की महाप्रकृति का निर्माण, हर एक की अपनी प्रकृति से होता है, अगर हम अपनी प्रकृति को स्वच्छ रखेंगे तो महाप्रकृति भी संतुलित रहेगी । पढ़ो को काटना, पशुयों को मारना, गन्दगी फैलाना विनाश को आमंत्रित देगा । इस से माँ भगवती पार्वती जो की परम प्रकृति है, उसे काली का स्वररूप धारण करने में अधिक देरी नहीं लगेगी ।

सभी भक्तो को सावन की ढेरो बधाई, शिव शक्ति आप सब पर किरपा बरसाई रखे ।

नमः शिवाय । 
जय माता की । 


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कैसे बनी ऋषि कात्यान की बेटी Maa Durga

एक समय की बात हैए ऋषि कात्यान ने जगदम्बा ललिता का व्रत अनुष्ठान करए उनसे वर माँगा की वह उनकी पुत्री के स्वरुप में जन्म लेए और माँ तथास्तु कह अंतर ध्यान हो गई। कालान्तर मेंए भगवती महाकाली ने सगुण रूप में सती के बाद पार्वती के रूप अवतार लिया । भगवती पार्वतीए माँ आदि शक्ति का शक्ति स्वरुप मानी जाती है। आदि शक्तिए जो की निर्गुण और त्रिदेवों की जननी हैए उन्होंने साकार रूप में जगदम्बा ललिता के रूप में अवतरण लिया और स्वयं को शक्ति स्वरुप अर्थात महाकालीध्पार्वतीए श्री स्वरुप अर्थात महालक्ष्मी और ज्ञान स्वरुप अर्थात महासरस्वती में विभाजन किया । माँ पार्वती ने शिव की कठिन टप कर उनको पति रूप में प्राप्त किया। माना जाता है कि तप करने के बाद माँ पार्वती का रंग काला पद गया। शिव ने पार्वती को काली कह कर सम्बोधित किया। माँ रुष्ट हो कैलाश से चल पड़ी और अरुणाचल प्रदेश के पर्वत श्रृंखला की गुफा में तप करना प्रारम्भ कर दिया।
उसी समय एक महिषासुर नामक एक राक्षश ने ब्रह्मा देव को प्रसन कर उनसे ये वर माँगा की वे केवल स्त्री द्वारा ही मारा जाए।  उधर माँ पार्वती ने भी अपनी टप शक्ति से अपनी योग शक्ति की मदद से गंगा जल से अपने तन की कालेपन को धो डाला । माँ पार्वती का रूप सवर्ण की भाँती चमकने लग पड़ा । माँ ने अपने शरीरकोश को ऋषि कात्यान के आश्रम में मिटटी से ढक दिया । उस समय कात्यान की पत्नी गर्भवती थीए और वह वाही वनस्पतियों का सेवन कर रही थी जिस जगह पार्वती माँ ने शरीर कोष छोड़ा था ।

इस वजह से वह कोशिकाएं कात्यान की पत्नी के गर्भ में चली गई और एक तेजस्वी बालिका का जन्म हुआए जिनका नाम कात्यानी रखा। वही दूसरी ओरए महिशसुर ने स्वर्गए पातालए ग्रेहलोक आदि सभी लोको पर अधिपत्य स्थापित कर लिया और पृथ्वी पर स्थित सभी को विष्णुए शिव की भक्ति करने से रोकना शुरू केर दियाए ऐसे में सभी देवता परेशान हो विष्णु और शिव के पास गएए ऐसा देख शिवा और विष्णु ने विचार कर सभी देवताओं से समस्त अग्रेह किया कि यदि हम सभी मिल कर अपनी शक्तियां शुक्र की सन्मुख एकत्रित करेंगे तो  वह तेज किसी स्त्री की कोख में अवश्य जाएगा शुक्र के प्रभाव से अवश्य जाएगा। और लक्ष्मी देवी से प्रेरणा पा करए समुन्द्र देव ने कात्यानी को जरकन हीरे का हार पहनाया और वह तेज देवी कात्यानी में चला गया। इसी कारण पार्वती स्वारूप कात्यानी दुर्गा बन गई जिसने महिषासुर का वध कर दिया।

कैसे Vedic Science Astronomy, physics और mathematical theorem से संबंधित है।

Astronomy के समामेलन, laws of physics and Mathematical theorems astrology में यह परिणाम है।


जिस तरह, Geologist मौसम रिपोर्ट की जानकारी निकालते है उसी प्रकार एक एस्ट्रोलॉजर भी Planetary motions के द्वारा भविष्य की prediction करता है। एक ब्रह्मांड बहुत बड़ी प्रणाली है। मनुष्य , पशु, देवी-देवता और असुर ( वे प्राणी जो धरती पर वास न करते हो) , सितारों और अन्य ग्रह इस ब्रह्मांड का हिस्सा हैं। जो भी तत्व ब्रह्मांड की प्रकृति को परेशान करने पर उतारू उन्हें ही असुर कहा जाता है। और प्रकृति अपने को सही रखने के लिए इन ग्रेहों, सितारों आदि की रचना करती है । इसी प्रकृति को आज सब Supreme Intelligence, (अँग्रेज़ी में Nature) पौराणिक भारत में भगवती दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित है। प्रकृति जब निर्गुण होती है तो वह Energy बन जाती है जो की वेदों में आदि शक्ति नाम से विख्यात है । यह समूचा ब्रह्माण्ड इसी Supreme Intelligence के Laws से चलता है।  इस Intelligence के किसी भी प्रदार्थ में प्रवेश करने से वह जीव बन जाता है। Being और Intelligence की अवधारणा "पुरुष और प्रकृति' की अवधारणा के रूप में जाना जाता है। एक पुरुष (Being) भावशून्य है और वह प्रकृति के बिना संचालित नहीं किया जा सकता है।



इसी तरह, ब्रह्मांडो में अनेको सौर मंडलों में उपस्थित ये ग्रह भी इस ब्रह्मांड के हिस्से हैं ।  यह ग्रह/सितारे ही पूरे ब्रह्मांड के संतुलन में Catalyst Agent के रूप में, आदि शक्ति / Supreme Intelligence द्वारा संचालित होते हैं। हम मनुष्य ब्रह्मांड की कोशिकाओं की तरह हैं। इन Catalyst Agents की वजह से  हम जीव भी प्रभावित होते हैं । ज्योतिष भी इन ग्रहों को समझ कर predictions करता है, हालांकि ये ज्ञान भी उस Supreme Intelligence या आदि शक्ति को पार/समझ नहीं सकता है, फिर भी हम (cells of the universe) दोनों ज्योतिषीय (luck)और शारीरिक तरीके (hard work) का पालन करके हम, अपने इस जीवन में बहुत ज्यादा सफल हो सकते है, और प्रकृति के नियमों का भी पालन कर सकते हैं।


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मानव.जीवन और ग्रहों का प्रभाव

मानव जीवन से संबन्धित अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है उसकी जीवन यात्राए जो न जाने कितनी लंबी है।ए संघर्ष ही जीवन यात्रा का दूसरा नाम हैए जिम्मेवारियों और कर्तव्यों का मिला जुला रूप है यह जीवन.यात्रा। सौरमंडल के नौ ग्रह प्रत्येक व्यक्ति की जीवन.यात्रा को संचालित करते हैए धरती पर कोई मानव.जीवन ऐसा नहीं जो ग्रहों के प्रभाव से वंचित होए बल्कि सजीव और निर्जीव दोनों पर ग्रहों का प्रभाव रहता हैए यदि किसी प्राणी पर इन ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव रहे तो उस व्यक्ति का जीवन किस कदर अस्त.व्यस्त हो सकता है इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल हैए ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव के कारण जीवन की परिस्थितियाँ इस तरह असहनीय हो सकती है कि व्यक्ति आत्महत्या तक की सोच रखने लगता हैए अब उसके जीवन की इस अस्त.व्यस्त गुथी को कौन सुलझाए।
Yes I Can Change
GD Vashist

आम व्यक्ति अगर चाहे तो अपनी जीवन.शैली मे परिवर्तन ला सकता हैए कार्य.क्षेत्र बदल सकता हैए घर बदल सकता हैए शहर बदल सकता है यहाँ तक कि वैज्ञानिक उपकरणो का इस्तेमाल करते हुए अपने होने वाले बच्चों की संख्या स्वयं निर्धारित कर सकता है पर वह अपने उस दुर्भाग्य को सौभाग्य मे नहीं बदल सकताए जो ग्रह दशा के कुप्रभाव के कारण है। इसे केवल एक परिपक्व ज्योतिषी ही बदल सकता है।

जब बच्चे का जन्म होता हैए उस समय सौरमंडल के कुछ ग्रह अग्रिम अवस्था मे होते हैंए उनकी रेज़ बच्चे पर सीधी पड़ती हैं और उस ग्रह के शुभ प्रभाव ही बच्चे की विशेषताएँ बन जाती हैंए कुछ ग्रह मध्यम अवस्था मे होते हैए उनका मिला.जुला प्रभाव बच्चे पर रहता हैए लेकिन कुछ ग्रह जो बिलकुल पीछे होते हैंए उनकी रेज़ बच्चे पर ना पड़ पाने के कारण उनका प्रभाव अशुभ रहता है। उस अशुभता को दूर करने के लिए किसी गुणवान ज्योतिषी को जन्म कुंडली दिखा कर उपाय कर लेना अत्यंत आवश्यक है। ताकि बच्चे को जीवन मे आने वाली मुश्किलों से बचाया जा सके।

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समय चक्र और ज्योतिष

समय गति शील है यह किसी के लिए नही रुकता। गुज़रा कल कोई वापिस नही ला सकताए चाहे वह कितना खरबपति है। सृष्टिकर्ता ने सृष्टि बनाते ही हर चीज का समय विभाजित कर दिया। सृष्टिकर्ता की सबसे सुंदर रचना मानव है उसकी आयु के भी चार ही चरण है बाल्य अवस्था यौवन.अवस्था अधेड़ अवस्था और वृदधा
अवस्था। बाल्य अवस्था मे किए जाने वाले काम यदि मानव यौवन अवस्था मे करने लगे तो क्या उसे शोभा देगाएया यौवन अवस्था के क्रिया.कलापों को क्या वह वृद्धावस्था मे कर सकता है।

मानव.के साथ साथ जो अन्य जीव आत्माएँ है वह भी सब समयानुसार मृत्यु को प्राप्त कर लेती हैं समय मुट्ठी
Yes I Can Change
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मे पकड़ी रेत के समान हैए धीरे.धीरे मुट्ठी से फिसलता जाता है। जीवन एक बहुत बड़ी पाठशाला है और समय से बड़ा कोई शिक्षक नही। बीता वक्त हमे बहुत कुछ सीखा जाता है और हमे जागा जाता है। जब बीते समय मे की गयी गलतियां बुरे परिणाम देने लगे तो व्यक्ति स्वयं भविष्य मे उन गलतियों को न दौहराने का फैंसला कर लेता हैए लेकिन जो गलतियाँ नही थी समय ही खराब गुजर रहा था परिस्थितियाँ ही अनुकूल नही रहीए वैसा वक्त जीवन मे ना आने पायेए इस तरह की सोच रखने वाले हर प्राणी को ज्योतिषीय ज्ञान का सहारा लेना ही उचित है।

बच्चे के जन्म होते ही यदि एक सही ज्योतिषी की देख.रेख मे जन्म कुंडली बनवाई जाए तो कुंडली देखते ही यह जाना जा सकता है कि इस कुंडली मे कहाँ पर क्या कमियाँ हैं पहले उन कमियों को दूर करने के लिए सब उपाय करना जरूरी है फिर सालाना वर्ष.फल को देखते हुएए ग्रह.योगों के अनुसार उपाय करना जरूरी हैए जन्म होते ही बनवाई जाने वाली कुंडली से पता चल जाता है की उम्र के किस पड़ाव पर किस तरह की मुश्किलें आ सकती हैंए उस बुरे वक्त को आने से तो रोका नही जा सकता परंतु उस समय के ग्रह योगों के अनुसार पहले ही उपाय हो जाने के कारण नुकसान नाम.मात्र के बराबर होगा। ज्योतिष ज्ञान ही एक ऐसा ज्ञान है जिसके द्वारा जीवन मे आने वाले बुरे वक्त को जाना जा सकता है।

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